षड्बल एवं भावबल सचित्र — अध्ययन सामग्री
हर्षज्योतिषम् श्रृंखला की हर्ष बावलिया द्वारा लिखित 82 पृष्ठों की हिंदी अध्ययन सामग्री। सात अध्यायों में व्याख्या, सूत्र, हल किए उदाहरण, सामान्य भूलें और अभ्यास-प्रश्न दिए गए हैं।
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अध्यायवार अध्ययन
उच्च, सप्तवर्गीय, ओजयुग्म, केन्द्रादि एवं द्रेष्काण बल
नतोन्नत, पक्ष, त्रिभाग, होरा, अहर्गण, अयन एवं ग्रह-युद्ध
दिशा के अनुसार ग्रहबल की गणना
गति, स्वाभाविक बल और ग्रह-दृष्टियों का अध्ययन
पिण्ड, योग, अनुपात एवं इष्ट-कष्ट बल
भाव-मध्य, भावाधिपति, दिक्-गणना एवं भाव-दृष्टि
सार-संग्रह, प्रश्न-बैंक, सामान्य भूलें एवं अभ्यास
कैसे पढ़ें?
पहले प्रत्येक बल का अर्थ और गणना समझें, फिर हल किए उदाहरण जाँचें। उसके बाद कुल षड्बल तथा भावबल पढ़ें। अभ्यास-प्रश्न स्वयं हल करने के बाद उत्तर से मिलाएँ।
षड्बल क्यों पढ़ते हैं?
पाराशरी गणना में षड्बल ग्रह की शक्ति को कई कोणों से मापने की पद्धति है। नाम का अर्थ “छह बल” है। इसे ग्रह के शुभ या अशुभ होने का एक अकेला अंक नहीं समझना चाहिए। बल की गणना और फल-निर्णय अलग चरण हैं।
छह प्रमुख भाग
- स्थान बल: राशि और स्थिति से जुड़ी शक्ति।
- दिग्बल: दिशा/भाव-संदर्भ से जुड़ा बल।
- काल बल: समय संबंधी घटक।
- चेष्टा बल: ग्रह की गति से जुड़े घटक।
- नैसर्गिक बल: परंपरागत स्वाभाविक बल।
- दृक् बल: दृष्टियों के प्रभाव का आकलन।
सीमा और संदर्भ
अधिक बल का अर्थ हर प्रसंग में अच्छा फल नहीं होता। ग्रह किन भावों का स्वामी है, किस भाव में है, उसकी दशा चल रही है या नहीं, और प्रश्न क्या है—ये सभी साथ पढ़े जाते हैं। अष्टकवर्ग एक अलग गणना-पद्धति है; दोनों की संख्याएँ सीधे समानार्थी नहीं हैं।
विस्तार से पढ़ें: विवान / Vivaan
हर्षज्योतिषम् / HarshJyotisham की दूसरी पुस्तक ‘विवान / Vivaan’ में षड्बल, भावबल, अष्टकवर्ग और अन्य गहन विषयों के उदाहरण दिए गए हैं। पुस्तक का परिचय मुखपृष्ठ पर देखें। पुस्तक देखें →