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लघुपाराशरी · अध्याय 3 · तृतीयोऽध्यायः (योगफलाध्यायः)

शास्त्रीय ग्रंथ केन्द्र / लघुपाराशरी

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लघुपाराशरी 3.14

केन्द्रत्रिकोणपतयः सम्बन्धेन परस्परम् ।
इतरैरप्रसक्ताश्चेद् विषेशफलदायकाः ॥ १४ ॥

लघुपाराशरी 3.15

केन्द्रत्रिकोणनेतारौ दोषयुक्तावपि स्वयम् ।
सम्बन्धमात्राद्बलिनौ भवेतां योगकारकौ ॥ १५ ॥

लघुपाराशरी 3.16

निवसेतां व्यत्ययेन तावुभौ धर्मकर्मणोः ।
एकत्रान्यतरो वापि वसेच्चेद्योगकारकौ ॥ १६ ॥

लघुपाराशरी 3.17

त्रिकोणाधिपयोर्मध्ये सम्बन्धो येन केनचित् ।
केन्द्रनाथस्य बलिनो भवेद्यदि सुयोगकृत् ॥ १७ ॥

लघुपाराशरी 3.18

दशास्वपि भवेद्योगः प्रायशो योगकारिणोः ।
दशाद्वयीमध्यगतस्तदयुक् शुभकारिणाम् ॥ १८ ॥

लघुपाराशरी 3.19

योगकारकसम्बन्धात् पापिनोऽपि ग्रहाः स्वतः ।
तत्तद् भुक्त्यनुसारेण दिशेयुर्योगजं फलम् ॥ १९ ॥

लघुपाराशरी 3.20

केन्द्रत्रिकोणाधिपयोरेकत्वे योगकारकौ ।
अन्यत्रिकोणपतिना सम्बन्धो यदि किं परम् ॥ २० ॥

लघुपाराशरी 3.21

यदि केन्द्रे त्रिकोणे वा निवसेतां तमोग्रहौ ।
नाथेनान्यतरेणापि सम्बन्धाद्योगकारकौ ॥ २१ ॥

लघुपाराशरी 3.22

धर्मकर्माधिनेतारौ रन्ध्रलाभाधिपौ यदि ।
तयोः समान्धमात्रेण न योगं लभते नरः ॥ २२ ॥

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