लघुपाराशरी 3.14
केन्द्रत्रिकोणपतयः सम्बन्धेन परस्परम् ।
इतरैरप्रसक्ताश्चेद् विषेशफलदायकाः ॥ १४ ॥
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केन्द्रत्रिकोणपतयः सम्बन्धेन परस्परम् ।
इतरैरप्रसक्ताश्चेद् विषेशफलदायकाः ॥ १४ ॥
केन्द्रत्रिकोणनेतारौ दोषयुक्तावपि स्वयम् ।
सम्बन्धमात्राद्बलिनौ भवेतां योगकारकौ ॥ १५ ॥
निवसेतां व्यत्ययेन तावुभौ धर्मकर्मणोः ।
एकत्रान्यतरो वापि वसेच्चेद्योगकारकौ ॥ १६ ॥
त्रिकोणाधिपयोर्मध्ये सम्बन्धो येन केनचित् ।
केन्द्रनाथस्य बलिनो भवेद्यदि सुयोगकृत् ॥ १७ ॥
दशास्वपि भवेद्योगः प्रायशो योगकारिणोः ।
दशाद्वयीमध्यगतस्तदयुक् शुभकारिणाम् ॥ १८ ॥
योगकारकसम्बन्धात् पापिनोऽपि ग्रहाः स्वतः ।
तत्तद् भुक्त्यनुसारेण दिशेयुर्योगजं फलम् ॥ १९ ॥
केन्द्रत्रिकोणाधिपयोरेकत्वे योगकारकौ ।
अन्यत्रिकोणपतिना सम्बन्धो यदि किं परम् ॥ २० ॥
यदि केन्द्रे त्रिकोणे वा निवसेतां तमोग्रहौ ।
नाथेनान्यतरेणापि सम्बन्धाद्योगकारकौ ॥ २१ ॥
धर्मकर्माधिनेतारौ रन्ध्रलाभाधिपौ यदि ।
तयोः समान्धमात्रेण न योगं लभते नरः ॥ २२ ॥
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