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लघुपाराशरी · अध्याय 2 · द्वितीयोऽध्यायः (फलनिर्णयाध्यायः)

शास्त्रीय ग्रंथ केन्द्र / लघुपाराशरी

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लघुपाराशरी 2.6

सर्वे त्रिकोणनेतारो ग्रहाः शुभफलप्रदाः ।
पतयस्त्रिषडायानां यदि पापफलप्रदाः ॥ ६ ॥

लघुपाराशरी 2.7

न दिशन्ति शुभं नृणां सौम्याः केन्द्राधिपाः यदि ।
क्रूराश्चेदशुभं ह्येते प्रबलाश्चोत्तरोत्तरम् ॥ ७ ॥

लघुपाराशरी 2.8

लग्नाद् व्ययद्वितीयेशौ परेषां साहचर्यतः ।
स्थानान्तरानुगुण्येन भवतः फलदायकौ ॥ ८ ॥

लघुपाराशरी 2.9

भाग्यव्ययाधिपत्येन रन्ध्रेशो न शुभप्रदः ।
स एव शुभसन्धाता लग्नाधीशोऽपिचेत्स्वयम् ॥ ९ ॥

लघुपाराशरी 2.10

केन्द्राधिपत्यदोषस्तु बलवान्गुरुशुक्रयोः ।
मारकत्वेऽपि च तयोर्मारकस्थानसंस्थितिः ॥ १० ॥

लघुपाराशरी 2.11

बुधस्तदनु चन्द्रोऽपि भवेत् तदनु तद्विधः ।
न रन्ध्रेशत्व दोषस्तु सूर्याचन्द्रमसोर्भवेत् ॥ ११ ॥

लघुपाराशरी 2.12

कुजस्य कर्मनेतृत्व प्रयुक्ता शुभकारिता ।
त्रिकोणस्यापि नेतृत्वे न कर्मेशत्वमात्रतः ॥ १२ ॥

लघुपाराशरी 2.13

यद्यद्भावगतौ वापि यद्यद्भावेशसंयुतौ ।
तत्तत्फलानि प्रबलौ प्रदिशेतां तमोग्रहौ ॥ १३ ॥

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