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लघुपाराशरी · अध्याय 1 · प्रथमोऽध्यायः (संज्ञाध्यायः)

शास्त्रीय ग्रंथ केन्द्र / लघुपाराशरी

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लघुपाराशरी 1.1

सिद्धान्तमौपनिषदं शुद्धान्तं परमेष्ठिनः ।
शोणाधरं महः किञ्चिद् वीणाधरमुपास्महे ॥ १ ॥

लघुपाराशरी 1.2

वयं पाराशरीं होरामनुसृत्य यथामति ।
उडुदायप्रदीपाख्यं कुर्मो दैवविदां मुदे ॥ २ ॥

लघुपाराशरी 1.3

फलानि नक्षत्रदशा प्रकारेण विवृण्महे ।
दशा विंशोत्तरी चात्र ग्राह्या नाष्टोत्तरी मता ॥ ३ ॥

लघुपाराशरी 1.4

बुधैर्भावादयः सर्वे ज्ञेया सामान्यशास्त्रतः ।
एतच्छास्त्रानुसारेण संज्ञां ब्रूमो विशेषतः ॥ ४ ॥

लघुपाराशरी 1.5

पश्यन्ति सप्तमं सर्वे शनिजीवकुजाः पुनः ।
विशेषतश्च त्रिदशत्रिकोण चतुरष्टमान् ॥ ५ ॥

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अध्याय 1 · स्रोत संस्करण: https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B2%E0%A4%98%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A5%80