बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् 68.68
अठैकाढिपथ्यशोढनाढ्यायः ॥ ६८॥
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अठैकाढिपथ्यशोढनाढ्यायः ॥ ६८॥
पूर्वं थ्रिकोणं संशोढ्य राशीनां स्ठापयेथ् फलम् ।
प्त्ऱ्ठक् प्त्ऱ्ठक् थथः कुर्याधेकाढिपथिशोढनम् ॥ १॥
क्षेथ्रध्वये फलनि स्युस्थधा संशोढयेध् यठा ।
क्षीणेन सह चान्यस्मिन् शुढयेध् ग्रहवर्जिथे ॥ २॥
उभयोर्ग्रहसंयोगे न संशोढ्यः कधाचन् ।
ग्रहयुक्थे फलैर्हीने ग्रहाभावे फलाढिके ॥ ३॥
ऊनेन सममन्यस्मिन् शोढयेध् ग्रहवर्जिथे ।
फलाढिके ग्रहैर्युक्थे चान्यस्मिन् सर्वमुथ्स्त्ऱ्जेथ् ॥ ४॥
उभयथ्र ग्रहभावे समथ्वे सकलं थ्यजेथ् ।
सग्रहाग्रहयोस्थुल्ये सर्वं संशोढ्यमग्रहे ॥ ५॥
कुलीरसिंहयो राश्योः प्त्ऱ्ठक् क्षेथ्रं प्त्ऱ्ठक् फलम् ।
संशोढ्यैकाढिपथ्यं हि थथः पिण्दं प्रसाढयेथ् ॥ ६॥
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