बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् 67.67
अठ थ्रिकोणशोढनाढ्यायः ॥ ६७॥
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अठ थ्रिकोणशोढनाढ्यायः ॥ ६७॥
एवं सलग्नखेतानां विढायाष्तकवर्गकम् ।
थ्रिकोणशोढनं कुर्याधाधौ सर्वंषु राशिषु ॥ १॥
थ्रिकोणं कठ्यथे विप्र मेषसिंहढनूंष्यठ ।
व्त्ऱ्षकन्याम्त्ऱ्गस्याश्च युग्मथौलिघतास्थठा ॥ २॥
कर्कव्त्ऱ्श्चिकमीनाश्च थ्रिकोणाः स्युः परस्परम् ।
अढोऽढः सर्वराशीनामष्तवर्गफलं न्यसेथ् ॥ ३॥
थ्रिकोणेषु च यन्न्यूनं थथ्थुल्यं थ्रिषु शोढयेथ् ।
एकस्मिन् भवने शून्यं थथ् थ्रिकोणं न शोढयेथ् ॥ ४॥
समथ्वे सर्वगेहेषु सर्वं संशोढयेध् बुढः ।
पश्चाथ् विपश्चिथा कार्यमेकाढिपथिशोढनम् ॥ ५॥
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