बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् 26.26
अथ ग्रहस्फुटदृष्टिकथनाध्ययाः॥२६॥
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अथ ग्रहस्फुटदृष्टिकथनाध्ययाः॥२६॥
भगवान् कतिधा दृष्टिर्बलं कतिविधं तथा।
इति मे संशयो जातस्तं भवान् छेत्तुमर्हिति॥ १॥
एका राशिवशाद् दृष्टिः पूर्वमुक्ता च या द्विज।
अन्या खेटस्वभावोत्था स्फुटा तां कथयाम्यहम्॥ २॥
त्रिदशे च त्रिकोणे च चतुरस्रे च सप्तमे।
पादवृद्धया प्रपश्यन्ति प्रयच्छन्ति फलं तथा॥ ३॥
पूर्णं च सप्तमं सर्वे शानिजीवकुजाः पुनः।
विशेषतश्च त्रिदशत्रिकोणचतुरष्टमान्॥ ४॥
इति सामान्यतः पूर्वैराचार्यैः प्रतिपादिता।
स्फुटान्तरवशाद्या च दृष्टिः साऽतिस्फुटा यथा॥ ५॥
दृश्याद् विशोध्य द्रष्टारं षड्राशिभ्योऽधिकान्तरम्।
दिगभ्यः संशोध्य तद्भागा द्विभक्ता दृक् स्फुटा भवेत्॥ ६॥
पञ्चाधिके विना राशिं भागाद्विघ्नाश्च दृक् स्फुटा।
वेदाधिके त्यजेद् भूताद् भागा दृष्टिः त्रिभाधिके॥ ७॥
विशोध्यार्णवतो द्वाभ्यां लब्धं त्रिंशद्युतं च दृक्।
द्व्यधिके तु विना राशिं भागास्तिथियुतास्तथा॥ ८॥
रूपाधिके विना राशिं भागा द्वयाप्ताश्च दृग् भवेत्।
एवं राश्यादिके शेषे शनौ द्रष्टरि भो द्विज॥ ९॥
एकभे नवभे भागा भुक्ता भोग्या द्विसंगुणाः।
द्विभेंऽशार्धोनिताः षष्टिरष्टभे खाग्नियुग् लवाः॥ १०॥
त्रिसप्तभे तु भौमस्य षष्टिरत्र लवोनिता।
सार्धांशास्तिथिसंयुक्ता द्विभे रूपं सदाऽङ्गभे॥ ११॥
त्रिसप्तभे तु जीवस्य भागार्धं शरवेदयुक्।
द्विगुणैस्तु लवैश्चोनाः खरसाश्चतुरष्टभे॥ १२॥
एवं रव्यादिखेटानां स्फुटा दृष्टिः प्रजायते।
तद्वशादेव भावानां जातकस्य फलं वदेत्॥ १३॥
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