फलदीपिका 10.1
कलत्र भव
शुभाधिपयुतेक्षिते सुतकलत्रभे लग्नतो
विधोरपि तयोः शुभं त्वितरथान सिद्धिस्तयोः |
सिताव्द्ययसुखाष्टगैः खरखगैरसन्नध्यगे
सितेऽप्यथ शुभेतरेक्षितयुते च जायावधः || १||
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कलत्र भव
शुभाधिपयुतेक्षिते सुतकलत्रभे लग्नतो
विधोरपि तयोः शुभं त्वितरथान सिद्धिस्तयोः |
सिताव्द्ययसुखाष्टगैः खरखगैरसन्नध्यगे
सितेऽप्यथ शुभेतरेक्षितयुते च जायावधः || १||
दारेशे सुतगे प्रणष्टवनितोऽपुत्रोऽथवा धीश्वरो
द्यूने वा निधनेश्श्वरोऽपि कुरुते पत्नीविनाशं ध्रुवम् |
क्षीणेन्दौ सुतगे व्ययास्ततनुगैः पापैरदारात्मजः
स्त्रीसंगाद्धननाशनं मदगयाः स्वर्भनुभान्वोर्वदेत् || २||
शुक्रे दृश्चकगे मदे मृतवधूः कामे वृषस्थे बुधे
स्त्रीनाशस्त्वथ नीचगे सुरगुरौ द्यूनाधिरुढे तथा |
जामित्रे भुषगे शनौ सति तथा भौमेऽथवा स्त्रीमृति-
श्चन्द्रक्षेत्रगयोर्मदेऽर्किकुजयोः पत्नी सति शोभना || ३||
अस्ते वास्तपतावसद्ग्रहयुते दृष्टेऽप्यसन्मध्यगे
नीचारातिगृहेऽर्ककान्त्यभिहते ब्रूयात्कलत्रच्युतिम् |
कमे वा सुतभाग्ययोर्विकलदारोऽसौ सपापे भृगौ
शुक्रे वा कुजमन्दवर्गसहिते दृष्टे परस्त्रीरतः || ४||
भौमार्क्यस्ते भॄगुजशशिनोर्दाहीनोऽसुतो वा
क्लीबेऽस्ते वा भवति भवगौ द्वौ ग्रहौ स्त्रीद्वयं स्यात् |
द्वन्द्वर्क्षाशे मदपतिसितौ तस्य जायाद्वयं स्यात्
ताम्यां युक्तैर्गगननिलयैर्दारसंख्यां वदन्तु || ५||
स्त्रीसंख्यां मदगैर्ग्रहैर्मृर्तिमसत्खेटैश्च सब्धिः स्थिती
द्यूनेशे सबले शुभे सति वधुः साध्वी सुपुत्रान्विता |
पापोऽपि स्वगृहं गतः शुभकरः पत्न्याश्चकामस्थिता
हित्वा षड्व्ययरन्ध्रपान्मदनगाः सौम्यास्तु सौख्यावहाः || ६||
भार्यानाशस्त्वशुभसहितौ वीक्षितौ वार्थकामौ
तत्र प्राहुस्त्वशुभफलदां क्रूरदृष्टि विशेषात् |
एवं पत्न्या अपि सति मदे चाष्मे वास्ति दोषः
सौम्यैर्दृष्टे सति शुभयुते दंपती भाग्यवन्तौ || ७||
चन्द्रे समन्दे मदगे पुन्रभूः
पतिर्भवेद्वाप्यसुतो विदारः |
नीचारिभस्थैरशुभैर्मदे स्त्री-
पुंसोर्मृतिः स्यान्निधने धने वा || ८||
लग्नात्कलत्रभवने समराशिसंज्ञे
भावाधिपेऽपि च तथैव गतेऽसुरेड्ये |
सूर्याभितप्तरहिते सुतदारनाथे
वीर्यन्विते तु जननं ससुतं कलत्रं || ९||
कुटुम्बदारव्ययराशिनाथा
जीवेक्षिताः कोणचतुष्टयस्थाः |
दारेश्चराद्वित्तकलत्रलाभे
सौम्याः कलत्रं ससुतं सुखाढ्यम् || १०||
लग्नास्तनाथस्थितभांशकोणे
नीचोच्चभे स्त्रीजननं च पत्युः |
चन्द्राष्टवर्गेधिककिन्दुराशौ
कलत्रजन्मेति तथा धवस्य || ११||
कामस्थकामाधिप्भार्गवाना
मृक्षं दिशं शंसति तस्य पत्न्याः |
शुक्रोऽस्तपो वा नतुनाथभांश-
त्रिकोणमायाति तदा विवाहः || १२||
कलत्रसंस्थस्य कलत्रदृष्टे
दर्शागमेवाथ कलत्रपस्य |
यदा विलग्नाधिपतिः प्रयाति
कलत्रभं तत्र कलत्रलाभः || १३||
कलत्रनाथस्थितभांशकेशयोः
सितक्षपानायकयोर्बलीयसः |
दशागमे द्यूनपयुक्तभांशक-
लत्रिकोणगे देवगुरौ करग्रहः || १४||
कलत्रनाथे रिपुनीचसंस्थे
मूढेऽथवा पापनिरीक्षिते वा
कलत्रभे पापयुतेऽथ दृष्टे
कलत्रहानी प्रवदन्ति सन्तः || १५||
संस्कृत विकिस्रोत के योगदानकर्ता · CC BY-SA 4.0 · सुरक्षित प्रति: 2026-10-11
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