बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् 37.1
सहस्ररश्मितचन्द्रे कण्टकादिगते क्रमात्।
धनधीनैपुणादीनि न्यूनमध्योत्तमानि हि॥ १॥
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सहस्ररश्मितचन्द्रे कण्टकादिगते क्रमात्।
धनधीनैपुणादीनि न्यूनमध्योत्तमानि हि॥ १॥
स्वांशे वा स्वाधिमित्रांशे स्थितश्च दिवसे शशी।
गुरुणा दृश्यते तत्र जातो धनसुखान्वितः॥ २॥
स्वांशे वा स्वाधिमित्रांशे स्थितश्च शशभृन्निशि।
शुक्रेण दृश्यते तत्र जातो धनसुखान्वितः॥ ३॥
एतद्विपर्ययस्थे च शुक्रेज्यानवलोकिते।
जायतेऽल्पधनो बालो योगेऽस्मिन्निर्धनोऽथवा॥ ४॥
चन्द्राद्रन्ध्रारिकामस्थै सौम्यैः स्याधियोगकः।
तत्र राजा च मन्त्री च सेनाधीशश्च बलक्रमात्॥ ५॥
चन्द्राद् वृद्धिगतैः सर्वैः शुभैर्जातो महाधनी।
द्वाभ्यां मध्यधनो जात एकेनाऽल्पधनो भवेत्॥ ६॥
चन्द्रात् स्वान्त्योभयस्थे हि ग्रहे सूर्यं बिना क्रमात्।
सुनफाख्तोऽनफाख्यश्च योगो दुरधराह्वयः॥ ७॥
राजा वा राजतुल्यो वा धीधनख्यातिमाञ्जनः।
स्वभुजार्जितवित्तश्च सुनफायोगसम्भवः॥ ८॥
भूपोऽगदशरीरश्च शीलवान् ख्यातकीर्तिमान्।
सुरूपश्चाऽनफाजातो सुखैः सर्वैः समन्वितः॥ ९॥
उत्पन्नसुखभुग् दाता धनवाहनसंयुतः।
सद्भृत्यो जायते नूनं जनो दुरधराभवः॥ १०॥
चन्द्रादाद्यधनाऽन्त्यस्थो विना भानुं न चेद्ग्रहः।
कश्चित् स्याद्वा विना चन्द्रं लग्नात् केन्द्रगतोऽथ वा॥ ११॥
योगः केमद्रुमो नाम तत्र जातोऽतिगर्हितः।
बुद्धिविद्याविहीनश्च दरिद्रापत्तिसंयुतः॥ १२॥
अन्ययोगफलं हन्ति चन्द्रयोगो विशेषतः।
स्वफलं प्रददातीति बुधो यत्नाद् विचिन्तयेत्॥ १३॥
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