बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् 19.1
आयुर्भावफलं चाऽथ कथयामि द्विजोत्तम।
आयुःस्थानाधिपः केन्द्रे दीर्घमायुः प्रयच्छति॥ १॥
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आयुर्भावफलं चाऽथ कथयामि द्विजोत्तम।
आयुःस्थानाधिपः केन्द्रे दीर्घमायुः प्रयच्छति॥ १॥
आयुस्थानाधिपः पापैः सह तत्रैव संस्थितः।
करोत्यल्पायुषं जातं लग्नेशोऽप्यत्र संस्थितः॥ २॥
एवं हि शनिना चिन्ता कार्या तर्कैर्विचक्षणैः।
कर्माधिपेन च तथा चिन्तनं कार्यमायुषः॥ ३॥
षष्ठे व्ययेऽपि षष्ठेशो व्ययाधीशो रिपौ व्यये।
लग्नेऽष्टमे स्थितो वाऽपि दीर्घमायुः प्रयच्छति॥ ४॥
स्वस्थाने स्वांशके वाऽपि मित्रेशे मित्रमन्दिरे।
दीर्घायुषं करोत्येव लग्नेशोऽष्टमपः पुनः॥ ५॥
लग्नाष्टमपकर्मेशमन्दाः केन्द्रत्रिकोणयोः।
लाभे वा संस्थितास्तद्वद् दिशेयुर्दीर्घमायुषम्॥ ६॥
एवं बहुविधा विद्वन्नायुर्योगाः प्रकीर्तिताः।
एषु यो बलवांस्तस्याऽनुसारादायुरादिशेत्॥ ७॥
अष्टमाधिपतौ केन्द्रे लग्नेशे बलवर्जते।
विंशद्वर्षाण्यसौ जीवेद् द्वात्रिंशत्परमायुषम्॥ ८॥
रन्ध्रेशे नीचराशिस्थे रन्ध्रे पापग्रहैर्युते।
लग्नेशे दुर्बले जन्तुरल्पायुर्भवति ध्रुवम्॥ ९॥
रन्ध्रेशे पापसंयुक्ते रन्ध्रे पापग्रहैर्युते।
व्यये क्रूरग्रहाक्रान्ते जातमात्रं मृतिर्भवेत्॥ १०॥
केन्द्रत्रिकोणगाः पापाः शुभाः षष्ठाष्टगा यदि।
लग्ने नीचस्थरन्ध्रेशो जातः सद्यो मृतो भवेत्॥ ११॥
पञ्चमे पापसंयुक्ते रन्ध्रेशे पापसंयुते।
रन्ध्रे पापग्रहैर्युक्ते स्वल्पमायुः प्रजायते॥ १२॥
रन्ध्रेशे रन्ध्रराशिस्थे चन्द्रे पापसमन्विते।
शुभदृष्टिविहीने च मासान्ते च मृतिर्भवेत्॥ १३॥
लग्नेशे स्वोच्चराशिस्थे चन्द्रे लाभसमन्विते।
रन्ध्रस्थानगते जीवे दीर्घमायुर्न संशयः॥ १४॥
लग्नेशोऽतिबली दृष्टः केन्द्रसंस्थैः शुभग्रहैः।
धनैः सर्वगुणैः सार्धं दीर्घमायुः प्रयच्छति॥ १५॥
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