बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् 21.1
कर्मभावफलं चाऽथ कथयामि तवाग्रतः।
सृणु मैत्रेय तत्त्वेन ब्रह्मगर्गादिभाषितम्॥ १॥
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कर्मभावफलं चाऽथ कथयामि तवाग्रतः।
सृणु मैत्रेय तत्त्वेन ब्रह्मगर्गादिभाषितम्॥ १॥
सबले कर्मभावेशे स्वोच्चे स्वांशे स्वराशिगे।
जातस्तातसुखेनाढ्यो यशस्वी शुभकर्मकृत्॥ २॥
कर्माधिपो बलोनश्चेत् कर्मवैकल्यमादिशेत्।
सैहिः केन्द्रत्रिकोणस्थो ज्योतिष्टोमादियागकृत्॥ ३॥
कर्मेशे शुभसंयुक्ते शुभस्थानगते तथा।
राजद्वारे च वाणिज्ये सदा लाभोऽन्यथान्यथा॥ ४॥
दशमे पापसंयुक्ते लाभे पापसमन्विते।
दुष्कृतिं लभते मर्त्यः स्वजनानां विदूषकः॥ ५॥
कर्मेशे नाशराशिस्थे राहुणा संयुते तथा।
जनद्वेषी महामूर्खो दुष्कृतिं लभते नरः॥ ६॥
कर्मेशे द्यूनराशिस्थे मन्दभौमसमन्विते।
द्यूनेशे पापसंयुते शिश्नोदरपरायणः॥ ७॥
तुङ्गराशिं समाश्रित्य कर्मेशे गुरुसंयुते।
भाग्येशे कर्मराशिस्थे मानैश्वर्यप्रतापवान्॥ ८॥
लाभेशे कर्मराशिस्थे कर्मेशे लग्नसंयुते।
तावुभौ केन्द्रगौ वापि सुखजीवनभाग् भवेत्॥ ९॥
कर्मेशे बलसंयुक्ते मीने गुरुसमन्विते।
वस्त्राभरणसौख्यादि लभते नात्र संशयः॥ १०॥
लाभस्थानगते सूर्ये राहुभौमसमन्विते।
रविपुत्रेण संयुक्ते कर्मच्छेत्ता भवेन्नरः॥ ११॥
मीने जीवे भृगुयुते लग्नेशे बलसंयुते।
स्वोच्चराशिगते चन्द्रे सम्यग्ज्ञानार्थवान् भवेत्॥ १२॥
केन्द्रेशे लाभराशिस्थे लाभेशे लग्नसंस्थिते।
कर्मराशिस्थिते शुक्रे रत्नवान् स नरो भवेत्॥ १३॥
केन्द्रत्रिकोणगे कर्मनाथे स्वोच्चसमाश्रिते।
गुरुणा सहिते दृष्टे स कर्मसहितो भवेत्॥ १४॥
कर्मेशे लग्नभावस्थे लग्नेशेन समन्विते।
केन्द्रत्रिकोणगे चन्द्रे सत्कर्मनिरतो भवेत्॥ १५॥
कर्मस्थानगते मन्दे नीचखेचरसंयुते।
कर्मांशे पापसंयुक्ते कर्महीनो भवेन्नरः॥ १६॥
कर्मेशे नाशराशिस्थे रन्ध्रेशे कर्मसंस्थिते।
पापग्रहेण संयुक्ते दुष्कर्म निरतो भवेत्॥ १७॥
कर्मेशे नीचराशिस्थे कर्मस्थे पापखेचरे।
कर्मभात्कर्मगे पापे कर्मवैकल्यमादिशेत्॥ १८॥
कर्मस्थानगते चन्द्रे तदीशे तत्त्रिकोणगे।
लग्नेशे केन्द्रभावस्थे सत्कीर्तिसहितो भवेत्॥ १९॥
लाभेशे कर्मभावस्थे कर्मेशे बलसंयुक्ते।
देवेन्द्रगुरुणा दृष्टे सत्कीर्तिसहितो भवेत्॥ २०॥
कर्मस्थानाधिपे भाग्ये लग्नेशे कर्मसंयुते।
लग्नात् पञ्चमगे चन्द्रे ख्यातनामा नरो भवेत्॥ २१॥
इति कर्मफलं प्रोक्तं संक्षेपेण द्विजोत्तम।
लग्नकर्मेशसम्बन्धादूह्यमन्यदपि स्वयम्॥ २२॥
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