बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् 13.1
धनभावफलं वच्मि स्रृणु त्वं द्विजसत्तम।
धनेशो धनभावस्थः केन्द्रकोणगतोऽपि वा॥ १॥
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धनभावफलं वच्मि स्रृणु त्वं द्विजसत्तम।
धनेशो धनभावस्थः केन्द्रकोणगतोऽपि वा॥ १॥
धनवृद्धिकरो ज्ञेयस्त्रिकस्थो धनहानिकृत्।
धनदश्च धने सौम्यः पापो धनविनाशकृत्॥ २॥
धनाधिपो गुरुर्यस्य धनभावगतो भवेत्।
भौमेन सहितो वाऽपि धनवान् स नरो भवेत्॥ ३॥
धनेशे लाभभावस्थे लाभेशे वा धनं गते।
तावुभौ केन्द्रकोणस्थौ धनवान् स नरो भवेत्॥ ४॥
धनेशे केन्द्रराशिस्थे लाभेशे तत्त्रिकोणगे।
गुरुशुक्रयुते दृष्टे धनलाभमुदीरयेत्॥ ५॥
धनेशो रिपुभावस्थो लाभेशस्तद्गतो यदि।
धनायौ पापयुक्तौ वा दृष्टौ निर्धन एव सः॥ ६॥
धनलाभाधिपावस्तौ पापग्रहसमन्वितौ।
जन्मप्रभृतिदारिद्रं भिक्षान्नं लभते नरः॥ ७॥
षष्ठेऽष्टमे व्यये वाऽपि धनलाभाधिपौ यदि।
लाभे कुजोधने राहू राजदण्डाद् धनक्षयः॥ ८॥
लाभे जीवे धने शुक्रे धनेशे शुभसंयुते।
व्यये च शुभसंयुक्ते धर्मकार्ये धनव्ययः॥ ९॥
स्वभोच्चस्थे धनाधीशे जातको जनपोषकः।
परोपकारी ख्यातश्च विज्ञेयो द्विजसत्तम॥ १०॥
स्थिते पारावतांशादौ धनेशे शुभसंयुते।
तद्गृहे सर्वसम्पत्तिर्विनाऽयासेन जायते॥ ११॥
नेत्रेशे बलसंयुक्ते शोभनाक्षो भवेन्नरः।
षष्ठाष्टमव्ययस्थे च नेत्रवैकल्यवान् भवेत्॥ १२॥
धनेशे पापसंयुक्ते धने पापसमन्विते।
पिशुनोऽसत्यवादी च वातव्याधिसमन्वितः॥ १३॥
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