बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् 12.1
सपापो देहपोऽष्टारिव्ययगो देहसौख्यहृत्।
केन्द्रे कोणे स्थितोऽङ्गेशः सदा देहसुखं दिशेत्॥ १॥
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सपापो देहपोऽष्टारिव्ययगो देहसौख्यहृत्।
केन्द्रे कोणे स्थितोऽङ्गेशः सदा देहसुखं दिशेत्॥ १॥
लग्नपोऽस्तङ्गतो नीचे शत्रुभे रोगकृद् भवेत्।
शुभः केन्द्रत्रिकोणस्था सर्वरोगहराः स्मृताः॥ २॥
लग्ने चन्द्रेऽथव क्रूरग्रहैर्दृष्टेऽथवा युते।
शुभदृष्टिविहीने च जन्तोर्देहसुखं न हि॥ ३॥
लग्ने सौम्ये सुरूपः स्यात् क्रूरेरूपविवर्जितः।
सौम्यखेटैर्युते दृष्टे लग्ने देहसुखान्वितः॥ ४॥
लग्नेशो ज्ञा गुरुर्वाऽपि शुक्रो वा केन्द्रकोणगः।
दीर्घायुर्धनवान् जातो बुद्धिमान् राजवल्लभः॥ ५॥
लग्नेशे चरराशिस्थे शुभग्रहनिरीक्षिते।
कीर्तिश्रीमान् महाभोगी देहसौख्यसमन्वितः॥ ६॥
बुधो जीवोऽथवा शुक्रो लग्ने चन्द्रसमन्वितः।
लग्नात् केन्द्रगतो वाऽपि राजलक्षणसंयुतः॥ ७॥
ससौरे सकुजे वापि लग्ने मेषे वृषे हरौ।
राश्यंशसदृशौ गात्रे स जातो नालविष्टितः॥ ८॥
चतुष्पदगतो भानुः परे वीर्यसमन्विताः।
द्विस्वभावगता जातौ यमलाविति निर्दिशेत्॥ ९॥
रवौन्दू एकभावस्थावेकंशकसमन्वितौ।
त्रिमात्रा च थिभिर्मासैः पित्रा भ्रात्रा च पोषितः॥ १०॥
एवमेव फलं वाच्यं चन्द्रादपि सदा बुधैः।
अथ जातनरस्याङ्गे व्रणचिह्नादिकं ब्रुवे॥ ११॥
शिरो नेत्रे तथ कर्णौ नासिके च कपोलकौ।
हनूर्मुखं च लग्नाद्या तनावाद्यदृकाणके॥ १२॥
मध्यद्रेष्काणगे लग्ने कण्ठोंऽसौ च भुजौ तथा।
पार्श्वे च हृदये क्रोडे नाभिश्चेति यथाक्रमम्॥ १३॥
वस्तिर्लिङ्गगुदे मुष्कावूरू जानू च जंघके।
पादश्चेत्युदितैर्वाममङ्गं ज्ञेयं तृतीयके॥ १४॥
यस्मिन्नङ्गे स्थितः पापो व्रणं तत्र समादिशेत्।
नियतं सबुधैः क्रूरैः सौम्यैर्लक्ष्म वदेद् बुधः॥ १५॥
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