बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् 8.8
अथ राशिदृष्टिकथनाध्यायः॥८॥
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अथ राशिदृष्टिकथनाध्यायः॥८॥
अथ मेषादिराशीनां चरादीनां पृथक् पृथक्।
दृष्टिभेदं प्रवक्ष्यामि श्रृणु त्वं द्विजसत्तम॥ १॥
राशयोऽभिमुखं विप्र तथा पश्यन्ति पार्श्वभे।
यथा चरः स्थिरानेवं स्थिरः पश्यति वै चरान्॥ २॥
द्विस्वभावो विनाऽत्मानां द्विस्वभावान् प्रपश्यति।
समीपस्थं परित्यज्य खेटास्तत्र गतास्तथा॥ ३॥
चरेषु संस्थिताः खेटाः पश्यन्ति स्थिरसङ्गतान्।
स्थिरेषु संस्थिता एवं पश्यन्ति चरसंस्थितान्॥ ४॥
उभयस्थास्तु सूर्याद्या पश्यन्युभयसंस्थितान्।
निकटस्थं विना खेटाः पश्यन्तीत्ययमागमः॥ ५॥
दृष्टिचक्रमहं वक्ष्ये ययावद् ब्रह्मणोदितम्।
तस्य विन्यासमात्रेण दृष्टिभेदः प्रकाश्यते॥ ६॥
प्राचि मेषवृषौ लेख्यौ कर्कसिंहौ तथोत्तरे।
तुलाऽली पश्चिमे विप्र मृगकुम्भौ च दक्षिणे॥ ७॥
एवं चतुर्भुजाकारं वृत्ताकारमथापि वा।
दृष्टिचक्रं प्रविन्यस्यैवं ततो दृष्टिं विचारयेत्॥ ९॥
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