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फलदीपिका · अध्याय 27 · सप्तविंशोऽध्यायः (प्रव्रज्यायोगः)

शास्त्रीय ग्रंथ केन्द्र / फलदीपिका

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फलदीपिका 27.1

प्रव्रज्या योग
ग्रहैश्चतुर्भिः सहिते खनोथे
त्रिकोणगैः केन्द्रगतैस्तु मुक्तः |
लग्ने गृहान्ते सति सौम्यभागे
केन्द्रे गुरौ कोणगते च मुक्तः || १||

फलदीपिका 27.2

एकर्क्षसंस्थैश्चतुरादिकैस्तु
ग्रहैर्वदेत्तत्र बलान्वितेन |
प्रव्रज्यकां तत्र वदन्ति केचित्
कर्मेशतुल्यां सहिते खनाथे || २||

फलदीपिका 27.3

शशी दृगाणे रविजस्य संस्थितः
कुजार्किदृष्टः प्रकरोति तापसम् |
कुजांशके वा रविजेन दृष्तो
नवांशतुल्यां कथयन्ति तां पुनः || ३||

फलदीपिका 27.4

जन्माधिपः सूर्यसुतेन दृष्टः
शेषैरदृष्तः पुरुषस्य सूतौ |
आत्मीयदीक्षां कुरुते ह्यवश्यं
पूर्वोक्तमत्रापि विचारणीयम् || ४||

फलदीपिका 27.5

योगीशं दीक्षित वा कलयति तरणिस्तीर्थपान्थं हिमांशु-
र्दुर्मन्त्रज्ञं च बौधाश्र्यमवनीसुतो ज्ञो मतान्यप्रविष्टम् |
वेदान्तज्ञानिनं वा यतिवरममरेड्यो भृगुलिङ्गवृत्त
व्रात्य शैलूषवृत्तिं शनिरिह पतितं वाऽथ पाषण्डिनं वा || ५||

फलदीपिका 27.6

अतिशयबलयुक्तः शीतगुः शुक्लपक्षे
बलविरहितमेन प्रेक्षते लग्ननाथः |
यदि भवति तपस्वी दुःखितः शोकतप्तो
धनजनपरिहीनः कृच्छ्रलब्धान्नपानः || ६||

फलदीपिका 27.7

प्रकथितमुनियोगे राजयोगो यदि स्या-
दशुभफलविपाकं सर्वमुन्मूल्य पश्चात् |
जनयति पृथिवीशं दीक्षितं साधुशीलं
प्रणतनृपहिरोभिः स्पृष्टपादाब्जयुग्मम् || ७||

फलदीपिका 27.8

चत्वारो द्युचराः खनाथसहिताः केन्द्रे त्रिकोणेऽथवा
सुस्थाने बलिनस्त्रयो यदि तदा सन्याससिद्धिर्भवेत्
सब्द्बाहुल्यवशाच्च तत्र सुशुभस्थानस्थितैस्तैर्वदेत्
प्रव्रज्यां महितां सताम्भिमतां चेदन्यथा निन्दिताम् || ८||

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